साल के आखिरी दिन यानी 31 दिसंबर को ऑनलाइन खाना मंगाने या ग्रोसरी ऑर्डर करने वालों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। देशभर के गिग वर्कर्स, खासकर फूड और क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म से जुड़े डिलीवरी पर्सन्स ने आज हड़ताल का ऐलान किया है। यूनियनों के अनुसार इस हड़ताल में करीब 1 लाख से अधिक डिलीवरी वर्कर्स के शामिल होने की संभावना है, जिससे न्यू ईयर सेलिब्रेशन से ठीक पहले सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।
यूनियनों का आरोप है कि जोमैटो, स्विगी, ब्लिंकिट, जेप्टो और अन्य प्लेटफॉर्म कंपनियां गिग वर्कर्स का शोषण कर रही हैं और उन्हें बुनियादी कानूनी अधिकार नहीं मिल रहे हैं। गिग एंड प्लेटफॉर्म सर्विसेज वर्कर्स यूनियन (GIPSWU) ने इस संबंध में केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मंडाविया को पत्र लिखकर तुरंत हस्तक्षेप की मांग की है। यूनियन का कहना है कि अगर सरकार ने उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया, तो इसका असर देश की अर्थव्यवस्था की ग्रोथ पर भी पड़ सकता है।
गिग वर्कर्स की हड़ताल की 5 बड़ी वजहें
1. सोशल सिक्योरिटी और वेलफेयर फंड का अभाव
गिग वर्कर्स की सबसे बड़ी मांग सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी है। सरकारी नियमों के बावजूद कई राज्यों में इन वर्कर्स को पेंशन, स्वास्थ्य बीमा और पीएफ जैसी सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं।
2. गिरती कमाई और इंसेंटिव में कटौती
वर्कर्स का कहना है कि पहले जहां प्रति ऑर्डर ₹40 से ₹60 तक मिलते थे, वहीं अब यह घटकर ₹15 से ₹25 के बीच रह गया है। इंसेंटिव स्ट्रक्चर में लगातार कटौती से उनकी आय पर सीधा असर पड़ा है।
3. खराब वर्किंग कंडीशन और 10 मिनट डिलीवरी का दबाव
क्विक कॉमर्स एप्स पर 10-12 मिनट में डिलीवरी का दबाव रहता है। वर्कर्स का आरोप है कि इस जल्दबाजी के कारण सड़क हादसों का खतरा काफी बढ़ गया है।
4. मनमाने तरीके से आईडी ब्लॉक करना
कई डिलीवरी पार्टनर्स का कहना है कि कंपनियां बिना किसी पूर्व सूचना या ठोस कारण के उनकी आईडी ब्लॉक कर देती हैं, जिससे उनका रोजगार अचानक छिन जाता है।
5. गिग वर्कर्स का कानूनी दर्जा
गिग वर्कर्स को अभी कंपनियों का “पार्टनर” माना जाता है, कर्मचारी नहीं। हड़ताल के जरिए उनकी मांग है कि उन्हें औपचारिक कर्मचारी का दर्जा दिया जाए।
किन शहरों में ज्यादा असर
इस हड़ताल का आह्वान तेलंगाना गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स यूनियन (TGPWU) और इंडियन फेडरेशन ऑफ ऐप-बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स (IFAT) ने किया है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, दिल्ली-एनसीआर, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में इसका असर ज्यादा दिख सकता है। यूनियन नेताओं का दावा है कि बड़ी संख्या में वर्कर्स ऐप से लॉग-आउट रहेंगे या सीमित काम करेंगे।
फूड डिलीवरी पर ज्यादा असर
एनालिस्ट्स के मुताबिक फूड डिलीवरी और क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म स्थानीय डिलीवरी पार्टनर्स पर ज्यादा निर्भर होते हैं, जबकि ई-कॉमर्स कंपनियों के पास बैकअप डिलीवरी नेटवर्क मजबूत होता है। यही वजह है कि इस हड़ताल का सबसे ज्यादा असर ऑनलाइन फूड और ग्रोसरी डिलीवरी सेवाओं पर पड़ने की संभावना है।
इससे पहले 25 दिसंबर को हुई सांकेतिक हड़ताल में करीब 40 हजार वर्कर्स शामिल हुए थे, जिससे कुछ शहरों में लगभग 60 प्रतिशत तक डिलीवरी प्रभावित हुई थी।


