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728 किलोमीटर का सफरः नर्मदा का नीर पहुँचा देश के आखिरी गाँव सुंदरा तक, बदली ज़िंदगी की धारा

Last updated: 10.04.2026 3:04 pm
Anjali Dadhich
Published: 10.04.2026

 राजस्थान के बाड़मेर जिले की भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बसा सुंदरा गाँव एक ऐतिहासिक बदलाव का साक्षी बना है। आज़ादी के बाद पहली बार इस दूरस्थ रेगिस्तानी गाँव के हर घर तक नल से स्वच्छ पेयजल पहुँचा है। यह केवल पानी की आपूर्ति नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही कठिनाइयों पर जीत और नई उम्मीदों की शुरुआत है।

सदियों पुराना गाँव, लेकिन बुनियादी सुविधाओं से दूर—

सन् 1734 में स्थापित सुंदरा कभी क्षेत्रफल की दृष्टि से देश की सबसे बड़ी ग्राम पंचायत माना जाता था। लगभग 1345 वर्ग किलोमीटर में फैले इस गाँव का जीवन हमेशा से रेगिस्तान की कठिन परिस्थितियों से जुड़ा रहा है। बाड़मेर मुख्यालय से करीब 170 किलोमीटर दूर बसे इस गाँव के लोगों को पीने के पानी के लिए वर्षों तक संघर्ष करना पड़ा।

यहाँ का भूजल इतना खारा था कि इंसानों के साथ-साथ पशु भी उसे पीने से कतराते थे। सरकार द्वारा लगाए गए ट्यूबवेल भी बेकार साबित हुए। मजबूरी में लोगों को 15दृ20 किलोमीटर दूर अन्य गाँवों से पानी ढोकर लाना पड़ता था।

युद्ध और विस्थापन की पीड़ा—

भारत-पाकिस्तान युद्ध 1965 और भारत-पाकिस्तान युद्ध 1971 के दौरान इस सीमा क्षेत्र के गाँव को खाली करवा दिया गया था। ऐसे में सुंदरा के लोगों ने न सिर्फ प्राकृतिक कठिनाइयों, बल्कि ऐतिहासिक चुनौतियों का भी सामना किया।

नर्मदा का नीरः एक असंभव को संभव करने वाली परियोजना—

इस क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या-पेयजल-का समाधान बना नर्मदा नहर आधारित पेयजल परियोजना। सरदार सरोवर बांध से शुरू होकर नर्मदा का पानी 728 किलोमीटर की लंबी दूरी तय कर सुंदरा तक पहुँचा।

करीब 513 करोड़ रुपये की इस महत्वाकांक्षी योजना के तहतः—

200 से अधिक गाँवों तक पानी पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया

16 बड़े जल संग्रहण केंद्र (CWR) बनाए गए

कई पम्पिंग स्टेशन स्थापित किए गए

80 से अधिक एलिवेटेड सर्विस रिज़र्वायर तैयार किए गए

रेत के ऊँचे-ऊँचे टीलों को काटकर पाइपलाइन बिछाना, बिजली की कमी और सीमा क्षेत्र में सुरक्षा प्रतिबंधकृइन सभी बाधाओं को पार करते हुए यह परियोजना पूरी की गई।

जब सपना हकीकत बना—

सुंदरा के लोगों के लिए यह बदलाव किसी चमत्कार से कम नहीं है। 80 वर्षीय महिलाओं ने पहली बार अपने घर के सामने मीठे पानी का नल देखा। दशकों तक खारा पानी पीने के कारण लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ाकृदाँत पीले होना, हड्डियाँ कमजोर होना और समय से पहले बुढ़ापा आम बात थी।

गाँव की महिलाओं को रोजाना कई किलोमीटर दूर पानी लाने की मजबूरी से अब मुक्ति मिल गई है। अब न सिर्फ समय की बचत होगी, बल्कि स्वास्थ्य और जीवन स्तर में भी सुधार आएगा।

नई शुरुआत की ओर कदम—

आज सुंदरा गाँव में नल से बहता पानी सिर्फ प्यास बुझाने का साधन नहीं, बल्कि विकास, सम्मान और बेहतर जीवन का प्रतीक बन चुका है। यह कहानी बताती है कि सही योजना, दृढ़ संकल्प और तकनीकी प्रयासों से देश के सबसे कठिन इलाकों में भी बदलाव संभव है।

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